खता बस इतनी हुयी की इबादत उसे बनाना चाहा
मोहलत ही नही दी उसने सज़दे में सर झुकाने को
मोहलत ही नही दी उसने सज़दे में सर झुकाने को
ताज महल हम भी बनवा देते
कमाई कम थी तो क्या
मोहब्बत तो हमने भी शाहजहाँ जेसी की थी
पर सायद मेरी मुमताज में दम कम था ।
कमाई कम थी तो क्या
मोहब्बत तो हमने भी शाहजहाँ जेसी की थी
पर सायद मेरी मुमताज में दम कम था ।
अल्फ़ाज़ बहोत है सीने में
जजब्बतो ने रोक रक्खा है
ज़ालिम है प्यार की ये दुनिया
उसे देखो वो भी उन्ही से मिल बैठा है।
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