मुकद्दर बनाने चले थे
दो कदम चल कर साथ तुम्हारे
ग़लतफ़हमी में जी रहे थे सायद
ठोकर कुछ इस कदर लगी की संभल ना सके फिर हम ।
दो कदम चल कर साथ तुम्हारे
ग़लतफ़हमी में जी रहे थे सायद
ठोकर कुछ इस कदर लगी की संभल ना सके फिर हम ।
कुछ उलझे से सावाल नज़र आते है, न दिन न रात बस खयाल नज़र आते है, हो तेरी हर बातो में जबाब मेरे सरे सवालो का, बस यही दिलो...
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