मुस्कुरा कर चाहत में,एक गुनाह कर बैठे।
ना चाहा जिसे दुबारा करना, वही प्यार फिर कर बैठे।
हर आरज़ू में तरासा जिसे हमने
आज वो चमक किसी ओर की है।
मुकद्दर भी हम थे, इस चाहतो की दुनिया में
ठोकर जो हमने खाया, और दुनिया बिखर गयी
किस किस का कसूर हम गिनाते
जिसका भी दिल नही लगा,वो हुमसे खेलता गया।
ज़िंदगी के सफर, में बहोत मोड़ आया
कुछ कदम साथ चला, और अगले मोड़ पर
खुद को तनहा पाया।
ना चाहा जिसे दुबारा करना, वही प्यार फिर कर बैठे।
हर आरज़ू में तरासा जिसे हमने
आज वो चमक किसी ओर की है।
मुकद्दर भी हम थे, इस चाहतो की दुनिया में
ठोकर जो हमने खाया, और दुनिया बिखर गयी
किस किस का कसूर हम गिनाते
जिसका भी दिल नही लगा,वो हुमसे खेलता गया।
ज़िंदगी के सफर, में बहोत मोड़ आया
कुछ कदम साथ चला, और अगले मोड़ पर
खुद को तनहा पाया।
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