मकसद बदल दिया उसने मेरा
अपनी दहलीज़ से ठुकरा कर मुझे
अब क्यों रो रही है सिमट कर
उसी दहलीज़ पर जा कर .....
अपनी दहलीज़ से ठुकरा कर मुझे
अब क्यों रो रही है सिमट कर
उसी दहलीज़ पर जा कर .....
कुछ उलझे से सावाल नज़र आते है, न दिन न रात बस खयाल नज़र आते है, हो तेरी हर बातो में जबाब मेरे सरे सवालो का, बस यही दिलो...
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